सत्ता का नशा या विचारधारा के प्रति निष्ठा

India Today Media Institute

लेखन-अनुराग शर्मा

नये दौर की राजनीति में अपनी ताक़त दिखाने के लिए आये दिन राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं द्वारा नए-नए तरीक़े देखने को मिलते हैं। सत्ता के नशे में चूर ये कार्यकर्ता शायद नए-नए पैंतरों से पार्टी विचारधारा के प्रति अपनी निष्ठा ज़ाहिर करने की कोशिश करते हैं ।
हाल ही में मुद्दा सामने आया है मूर्तियाँ तोड़ने का, जिसमें अपनी पार्टी, धर्म व समाज के विपरीत विचारधारा वाले महानुभावों की मूर्ति को ध्वस्त किया जा रहा है ।
अभी त्रिपुरा में भारतीय जनता पार्टी ने जीत हासिल की ही थी कि सत्ता में आते ही ज़मीनी कार्यकर्ताओं ने दक्षिण त्रिपुरा के बेलोनिया में वामपंथियों के आदर्श व्लॉडिमीर लेनिन की मूर्ति को ध्वस्त कर दिया, अभी यह मामला प्रका
आया ही था कि शायद त्रिपुरा की घटना और वहाँ के कार्यकर्ताओं से प्रेरित होके उत्तर प्रदेश के मेरठ में भारतीय संविधान के निर्माता कहे जाने वाले डॉ अम्बेडकर की भी मूर्ति को ध्वस्त करने की कोशिश की गयी।

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साथ ही दक्षिण राज्य तमिल नायडू के वेल्लोर में भाजपा नेता एच.राजा के ट्वीट के बाद पेरियार की मूर्ति को भी ध्वस्त कर दिया गया। अब मूर्ति तोड़ना एक ‘लेटेस्ट ट्रेंड’ के रूप में उभरा और इसकी लय पश्चिम बंगाल तक भी जा पहुँची जहाँ जनसंघ के संस्थापक एस पी मुखर्जी की मूर्ति को क्षेत्रीय दलों के कार्यकर्ताओं द्वारा ध्वस्त कर दिया गया। अब यह एक बड़ी साम्प्रदायिकता की ओर बढ़ रहा था और मानो संघियों को एक ऐसा काम करने का मौक़ा मिल गया जिसका वह बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे; मौक़ा था भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मूर्ति तोड़ने का। शुरू से ही कई मामले नज़र में आयें हैं जिनसे से आभास होता नज़र आया है की संघ की विचारधारा महात्मा गांधी  हमेशा विपरीत ही रही है तो यह कहा जा सकता है की आख़िर ‘मूर्ति तोड़ो अभियान’ के तहत संघियों को एक मौक़ा तो मिल ही गया जिसका उनको लम्बे  बेसब्री से इंतज़ार था पर हाँ शायद सीमित आय के चलते वह मजबूर और लामबंद हैं की जेब में रखा हुआ गांधी की तस्वीर वाला नोट नहीं फाड़ सकते ।India Today Media Institute

हालाँकि हमेशा की तरह कुछ वरिष्ठ नेतागण अपनी रटी-रटाई प्रतिक्रिया ज़ाहिर कर ‘प्रोटोकॉल’ निभाते नज़र आये जैसे मोदी जी ने कहा की इस तरह की हरकतें पूर्णतः अनधिकृत हैं और इस विषय में वे गृहमंत्री राजनाथ सिंह से वार्ता करेंगे,
वहीं राजनाथ सिंह ने कड़ी निंदा कर ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले सभी पार्टी कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ सख़्त क़दम उठाने की चेतावनी दी,
अमित शाह ने भी कार्यकर्ताओं को अनुशासन में रहने की सलाह दी,
वहीं विपक्षी नेता मल्लिकार्जन खड़गे ने सरकार पर लोकतंत्र के ख़िलाफ़ चलने का आरोप लगाया और सरकार को समाज में स्वतंत्रता, समानता का संदेश देने की सलाह दी।पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने भी घटना को असहनशील बताया।

अगर पिछले कुछ सालों पर नज़र डालें तो ऐसी घटना पहली बार नहीं हुई है, कुछ साल पहले भी ऐसी ही एक चर्चित घटना उत्तर प्रदेश की राजनीतिक भूमि से सामने आयी थी जिसमें समाजवादी पार्टी के चुनाव जितने के बाद ही पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रिमो मायावती की मूर्ति को खुलेआम मिडिया के सामने ही तोड़ दिया गया था।

पर उस समय मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक सफ़ल व्यक्तित्व का उदाहरण देना चाहा और मूर्ति को दोबारा बनवा दिया।

 

पर सोचने की बात यह है कि आख़िर इन सब पार्टी विचारधाराओं की लड़ाई में फ़ायदा नुक्सान किसका हो रहा है ? तो आर्थिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से देखा जाए तो फ़ायदा तो किसी का नहीं पर नुक्सान जनता का हो रहा है, जनता के पैसों का हो रहा है, उन पैसों का जो जनता मेहनत से कमाती है और फ़िर सरकार को टैक्स के रुप में देती है ।

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सरकारें अपने आपसी अभिमान के चलते जनता, देश व राजकीय ख़ज़ाने के साथ लगतार खिलवाड़ कर रहीं हैं और जनता को भी सामाजिक आधार पे गुटों में बाट कर इस अभिमान और विचारधारा की लड़ाई का हिस्सा बना रही हैं। भारतवर्ष की मासूम जनता को भी अब जागरूक होके अपना दायित्व समझना होगा और ऐसी जनविरोधी शक्तियों के ख़िलाफ़ एक-जुट होकर देश को सिर्फ़ विकास की राह पर अग्रसर करना होगा ।

लेखक के बारे में- लेखक अनुराग शर्मा, इंडिया टुडे मीडिया इन्स्टिटूट में प्रशिक्षु पत्रकार हैं

प्रकाशन- अनुराग शर्मा


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