एक कदम उड़ान की ओर….

India Today Media Institute

Written by- Tanpreet

हाल ही में रेलीज़ हुई “पैड मैन”फ़िल्म में महिला सशक्तिकरण का इज़हार किया गया है।  महिलाएं  कैसे आत्म-निर्भर रहें, आर्थिक रूप से आत्म-निर्भर। आज के दौर में महिला सशक्तिकरण, स्वतंत्र होना, आर्थिक रूप से आत्म निर्भर होना एक औरत के लिए सबसे अहम और ज़रूरी बन गया है और यह बदलाव देखा भी जा सकता है। महिलाएं घर पर बैठने से ज्यादा काम करके खुद को व्यस्त रखना पसंद कर रही हैं। फिर चाहे वो काम हो कपड़े सिलने का, अध्यापिका या फिर पार्लर चलाना। पर अपने पैरों पर खड़ा होना ही आज के युवा महिलाओं की मांग है।
India Today Media Institute
Picture Courtesy: The IGC Org.

पत्रकारिता आजकल का सबसे रोचक व्यवसायों में जाना जा रहा है। निडरता और इच्छाशक्ति इसके अहम बिंदु हैं।ऐसी ही एक निडर, तीव्र और सबल श्री नगर की रहने वाली मीना( बदल हुआ नाम) ने बताया कि कश्मीर में हमेशा होती हिंसा के बीच उसने कैसे ख़ुद को प्रबल बनाया और एक फोटो जर्नलिस्ट बनके,आत्म निर्भरता से अपना काम करती है। मीना ने कश्मीर में होती आएदिन होती हिंसक घटनाओं का ज़िक्र करते हुए कहा कि-“यहाँ रोज़ किसी न किसी कारण से दंगे होते रहते है, शहर को बंद करार दिया जाता है। ऐसे में मुझे प्रेरणा मिली और मैंने फ़ोटो जर्नलिस्ट बनने का सोचा।”
मीना ने यह भी बताया कि कैसे वह उग्र स्थितियों में दृढ़ता के साथ अपना काम करती है।हिजाब में ढकी यह फ़ोटो जर्नलिस्ट से कश्मीर में रहने वाली और लड़कियाँ भी प्रेरित हैं और कश्मीर के ऐसे हालात के बावजूद लड़कियाँ वहाँ आत्म निर्भर होने को प्राथमिकता देती हैं।

India Today Media Institute
Picture Courtesy: News X
India Today Media Institute
Picture Courtesy: The Indian Express

कश्मीर ही नहीं, ऐसे बहुत से राज्य हैं जहाँ औरतों को कमज़ोर कड़ी समझा जाता है। जहाँ सिर्फ सोच है कि औरतें घर का काम करने के लिए बनी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार भारत में 26.8% लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले कर दी जाती है। भारत में आज भी ऐसे पिछड़े वर्ग हैं जहाँ लड़की के 12 साल होने का भी इंतेज़ार नही किया जाता और रही बात पढ़ाई की वो तो सोच के भी परे है। अगर ऐसे ही चलते रहेगा तो सशक्तिकरण कैसे होगा? क्या महिलाएं मर्दों की तरह सामान्य अधिकार पाने की हकदार नहीं है? क्यो औरत को अबला के ही रूप में देखा जाता है?
पर अब समय है समय बदलने का, सोच बदलने का, एक कड़ाम बढ़ाने का। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा सुनने में अच्छा लगता है ना, अब वक्त है उस नारे को पूरी तरह सच में तब्दील करने का।

एक ऐसी ही जंबाज़ बेटी  का उदहारण है-“मालविका अय्यर”, जो दोनों हाथों से दिव्यांग है । बॉम्ब ब्लासट पिड़ित, मालविका एक मोटिवेशनल स्पीकर एयर समाज सेवक है। वो कहती है-” मुश्किलें सब पर आती है, किसी पे छोटी तो किसी पे बड़ी, पर उन मुसीबतों और मुश्किलों का सामना कैसे करना है यह हम पर निर्भर करता है। या तो रो लीजिये, या मुश्किलों से पार होजाइये”।

India Today Media Institute
Picture Courtesy: Hindustan.
India Today Media Institute
Picture Courtesy: India Spend
About the Author: Tanpreet  is a trainee journalist at India Today Media Institute.
Published By: Shubhrika Bahadur Satyawakta

Disclaimer- Any views or opinions represented in this blog belong solely to the writer and do not represent those of people, institutions or organizations that the owner may or may not be associated with in professional or personal capacity, unless explicitly stated. Any views or opinions are not intended to malign any religion, ethnic group, club, organisation, company or an individual. All content provided on this blog is for informational purposes only. The owner of this blog makes no representations as to the accuracy or completeness of any information on this site or found by following any link on this site.