2018 : भारत के सामाजिक – आर्थिक ढांचे के लिए चुनौती और अवसरों वाला साल

लेखक- गर्वित बंसल
वर्ष 2017 गुजर चुका है । नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े आर्थिक परिवर्तनों के चलते बाजार में छाई सुस्ती के कारण यह साल निराशा भरा था . बढ़ती बेरोजगारी अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन कर उभरी। शहरी और ग्रामीण अर्थव्यस्था की दौड़ में विकास असंतुलित दिखाई दिया । देश में बढ़ती हिंसा की घटनााओं ने भारत के सामजिक ढांचे को चरमराया। कला और सिनेमा से जुड़े विवाद ने प्रगतिशील समाज की धारणा को अवरोध कर दिया। लेकिन सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर लगातार जूझते भारत के लिए साल 2017 के अंतिम कुछ महीने बड़ी घटनाओं के दौर से गुजरे । सबसे अधिक युवा आबादी वाला देश इंटरनेट जनरेशन में तब्दील होने की कगार पर है। जिओ की सफलता ने देश के मिज़ाज़ को धार दी। ऊर्जा से भरी महत्वकांशी युवा आबादी अपेक्षाओं से भरी दिखाई दी। अश्व्मेघ के रथ पर सवार ब्रांड मोदी का गुजरात मॉडल गुजरात में ही देश के लोकतंत्र के आगे नतमस्तक हुआ। विराट -अनुष्का विवाह साल के अंतिम दौर में देश को आनंदित कर गया। कुल मिलाकर निराशा के बीच छिपी आशा का संकेत साल 2017 जाते – जाते देकर गया है। वर्ष 2018 की बुनियाद साल 2017 के इसी संकेत पर टिकी है। ये साल चुनौतियों और अवसरों से भरा है। जीएसटी लागू होने के बाद राजस्व बढ़ने की सरकार की अपेक्षा पूरी नहीं हो पायी। कम राजस्व के कारण केंद्र सरकार को जीएसटी प्रावधान के चलते राज्य सरकार को इसकी भरपाई करनी पड़ेगी। सरकार का राजकोषीय घाटा पहले ही 112 फीसदी पर पहुँच गया है। सरकार अब 50,000 करोड़ का कर्ज लेने वाली है। राजकोषीय घाटा बढ़ने के कारण सरकार अपने खर्चो को कम करने का प्रयास करेगी जिसका सीधा असर नये रोजगारों और आधारभूत ढांचे के विकास पर पड़ने वाला है। बड़े आर्थिक परिवर्तनों के चलते भारत का आद्यौगिक जगत धीमा हो गया है जिसके चलते वह नए रोजगार बड़ी मात्रा में उत्पन नहीं कर पा रहा है साथ ही पहले से चल रहे रोजगारों पर भी संकट दिखाई दे रहा है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विकास की मुख्यधारा में शामिल करना और कृषि क्षेत्र को उसका उचित मूल्य उपलब्ध करवाना देश के एक बड़े वर्ग के हिसाब से बड़ी चुनौती है। पिछले कुछ महीनों में लगातार बढ़ती हिंसा की घटनाओं ने भारत की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद पर टिके सामजिक ढाँचे को भी प्रभावित किया है। इन सब चुनौतियो के बीच में दुनिया का सबसे जवान हो रहा देश i (इंटरनेट ) क्रांति की नई दांस्ता लिखने के लिए उत्साहित है। आर्थिक समृद्धि पाने को बेताब और दुनिया की नज़रे अपने और टिकाने की चाह में भारत की युवा पीढ़ी बेक़रार है। ट्विटर और फेसबुक के जरिये देश की युवा पीढ़ी राजनैतिक – सामजिक बहस का नया नैरेटिव खड़ा कर रही है। डेटा रेवोलुशन , यंग इंटरप्रेन्योर , स्टार्टअप जैसे शब्दों का जमाना है। दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक भारत ग्लोबल इकॉनमी में खुद को खड़ा करना चाह रहा है। दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन मार्केट बन कर भारत ने डिजिटल इंफ़्रा के अपने इरादे जाहिर कर दिए है। सामजिक गतिविधियों से सरोकार रखकर यह युवा जमाना अपनी सामजिक जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभा रहा है।
2018 का साल इन्ही चुनौतियों और अवसरों से भरा साल रहने वाला है। रोजगार , ग्रामीण अर्थव्यवस्था , आधारभूत ढाँचे का विकास और मजबूत सामजिक ढाँचा जैसी बड़ी चुनौतियों जंहा देश के सामने होगी वही इंटरनेट के घोड़े पर दौड़ती देश की युवा पीढ़ी ग्लोबल इकॉनमी में हिंदुस्तान को खड़ा करने के अवसर तलाश रही है ।

लेखक के बारे में – लेखक गर्वित बंसल, इंडिया टुडे मीडिया इंस्टिट्यूट में प्रशिक्षु पत्रकार हैं

प्रकाशन- अनुराग शर्मा


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