अयोध्या विवाद, अध्याय-२ : राजनेताओं का बाबरीनामा

लेखन- विकास कुमार

भारतीय राजनीति में पिछले तीन दशक में अगर किसी मुद्दे ने सबसे ज्यादा हलचल मचाई है , तो वो बिना किसी दो राय के राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद होना चाहिए। ये एक ऐसा मुद्दा है जिसकी चर्चा के साथ ही राजनीति की बिसातें बिछने लगती हैं और वोटबैंक की मूसलाधार बारिश होती है। हमारे धुरंधर राजनेता सारी राजनीति को दरकिनार करते हुए बाबरीनामा की गाथा का अमृतपान करने लगते हैं। आइये जरा एक नज़र डालते हैं , कैसे हमारे राजनैतिक तंत्र ने इस मुद्दे के सहारे अपनी राजनीति को चमकाने की अभूतपूर्व कोशिश की है।

ज्यादा इतिहास में ना जाते हुए सीधे मुद्दे की राजनीति पर आयें तो, 1985 में शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला शाहबानो के पक्ष में दिया और उसके बाद पूरे देश के मुस्लिम संगठनो ने देश की सर्वोच्च न्यालय के इस फैसले के खिलाफ पूरे देश में इंकलाब की खुली धमकी दी , वो सीधा -सीधा सरकार को खुली चुनौती दे रहे थे। कुछ सांसदों के विरोध के बावजूद सरकार ने 1986 में इस फैसले को पलट दिया। मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे राजीव गाँधी सरकार के शर्मनाक समर्पण ने ही ‘अयोध्या विवाद’ को पुनः हवा देने का काम किया। अगले ही महीने में फैज़ाबाद की जिला अदालत में ‘उमेश पांडेय’ नाम के एक व्यक्ति ने अर्ज़ी दायर की और उसमे विवादित स्थल पे हिन्दुओं के पूजा -अर्चना के लिए ताला खोले जाने की इज़ाज़त मांगी गई । दो दिनों के भीतर ही अदालत ने सुनवाई पूरी कर इज़ाज़त दे दी , अदालत के फैसले को जिला प्रशासन ने चालीस मिनटों के भीतर ही लागू कर दिया । ये आज़ाद भारत का सबसे तेज़ी से लागू किया गया फैसला था और इस मुश्तैदी का कारण ‘राजीव गाँधी’ को बताया जाता है ।

शाहबानो के फैसले को पलटने के बाद से ही उनके ऊपर ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के आरोप लग रहे थे और इसी आरोप को धोने के लिए उन्होंने अयोध्या मामले में इतनी मुश्तैदी दिखाई। उसके बाद से ही देश में वोटबैंक राजनीति की स्थापना हुई और राजनीति का स्तर तेज़ी से नीचे गिरता गया। सबने अपने हिस्से का योगदान दिया और दो समुदायों को हमेशा के लिए जानी दुश्मन बना दिया।

30 अक्टूबर 1990 को उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने अयोध्या में कार- सेवकों पे गोली चलाने का आदेश दिया , जिसमें 16 लोगों की मौत हो गयी और इस घटना के बाद उनको ‘मौलाना मुलायम’ की उपाधि से नवाज़ा गया। इसके बाद नेता जी मुसलमानों के मसीहा के रूप में उभरे और राजनीति में दिन दूना रात चौगुना प्रगति किये।

1990 में ही भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री वी .पी .सिंह ने अपनी राजनेतिक यात्रा को अमर बनाने के लिए ‘मंडल कमीशन’ की सिफारिशों को लागू करने का फैसला किया। इस एक फैसले ने देश की राजनीति के साथ -साथ भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को हिला के रख दिया , तो बीजेपी ने मंडल का जवाब ‘कमंडल’ से दिया। बीजेपी के खेवनहार लाल कृष्ण आडवाणी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए ‘रथ यात्रा’ आरम्भ की और उसके बाद तो आरएसएस और विहिप के लोगों ने पूरी ताकत झोंक दी। राम रथ बिहार में आकर थम गया और लालू प्रसाद यादव ने आडवाणी को गिरफ्तार करवा के अपना भी नाम भारतीय राजनीति में हमेशा के लिए अमर कर दिया।

इस तरह राम मंदिर- बाबरी विवाद ने बहुत सारे राजनेताओं को राजनीतिक रसातल से निकालकर राष्ट्रीय राजनीति में हमेशा के लिए स्थापित कर दिया, वोटबैंक की लूट में सबने अपना अतुलनीय योगदान दिया। दोनों समुदाय आज तक पटका -पटकी कर रहे हैं , लेकिन अभी तक न मंदिर बना न मस्जिद, बस फासले बढ़ते गए , दूरियां बढ़ती गयीं और मीडिया को टीआरपी मिलता गया , यही है राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद की पूरी कहानी।

लेखक के बारे में- लेखक विकास कुमार, इंडिया टुडे मीडिया इन्स्टिटूट में प्रशिक्षु पत्रकार हैं

संपादन एवं प्रकाशन- अनुराग शर्मा


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