संतुलन: कला और जीविका के बीच

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संतुलन जीवन जीने का एक मूल मन्त्र है, बगैर संतुलन के जीवन निर्वाह कर पाना संभव नहीं| जीवन के हर क्षेत्र में संतुलन होना न केवल जरूरी है बल्कि ये कहना भी अतिश्योक्ति न होगी के बगैर संतुलन के जीवन जिया ही नहीं जा सकता जनाब! यदि आप जीवन जीना चाहते हैं और एक उत्तम जीवन जीना चाहते हैं तो यकीनन बगैर संतुलन के आप इसकी कल्पना भी न करें|

कला को साधना अपने आप में एक तप के समान है… मेरा व्यक्तिगत मत है की यदि आप कलाकार है तो आप योगी या तपस्वी तो स्वयमेव ही हो लिए| कला जीवन के कुरुक्षेत्र में अर्जुन के गांडीव के समान तुम्हारा अस्त्र है जो इस जीवन रुपी महाभारत में तुम्हे अपने अस्तित्व को न केवल बचाने अपितु सवारने में भी अहम् भूमिका निभाएगी| कला वो रत्न है जो आपको बाकि पत्थरों से अलग कर देता है, आपकी अलग पहचान है आपकी कला| वो है तुम्हारे अस्तित्व की सूचक,कला दिखाती है की आप बाकियों से कितने और कैसे अलग हुए|

सुबह देखा एक छोटी सी बच्ची अपनी कला का प्रदर्शन कर रही थी, मैदान पर वो बच्ची रस्सी पर चलकर अपनी कला दिखा रही थी और लोग बड़े चाव से देख रहे थे, जब जब वो रस्सी पर बहकती लोगों की साँसें थम जाती थी… हाँ आगे बस कोई नही आना चाहता था| कला का प्रदर्शन पूरा हुआ,लोगों से खूब वाहवाही भी बटोर ली उसने,लोगों ने सराहा भी खूब…. फिर आया वो समय जब आपको पता चलता है की ये प्रदर्शन कला का नहीं उस लड़की की मजबूरी का था, उस मजबूरी का जो ये बताता था की ये सब कला या जूनून से नहीं जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए किया गया था| अब वो और उसके साथी दर्शकों से अपने कला के प्रदर्शन के लिए पैसे मांगने लगे थे| वो एक पल का झटका जो था न एक दर्शक के नाते और एक कलाकार के नाते मुझे आहत कर गया…. वो लोग जो उसे २ मिनट पहले कलाकार की संज्ञा दे रे थे अब उसे पैसे मांगने वाले बच्चे के रूप में देखने लगे थे| जिसकी तुलना कलाकार से हो रही थी बल्कि किसी ने तो ये भी कहा कि जिम्नास्टिक जैसे खेलों में ये बच्चे भारत को ओलिंपिक में पदक ला सकते हैं, बस पर्याप्त मार्गदर्शन की जरूरत है इनको…वही उनसे मुंह फेरते हुए ये कहने लगे थे की बताओ पैसे मंगवा रहे हैं इनके माँ-बाप बच्चों से|

कहने का तात्पर्य केवल इतना है की फेर केवल समझ का है की आप कला को कला के जैसे ही देखते हैं या जीवन यापन का साधन? या वो व्यक्ति जो कला को जीवन यापन का साधन बनाता है तो इसमें गुरेज़ क्या? क्यूँ वो व्यक्ति हमारे आपके स्तर से एकाएक नीचे हो गया ? विचार कीजियेगा|

 

लेखक़ के बारे में – लेखक़ देवर्षि त्रिपाठी , इंडिया टुडे मीडिया इंस्टिट्यूट में प्रशिक्षु पत्रकार हैं।
संपादक एवं प्रकाशक – शुभ्रिका बहादुर सत्यवक्ता


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