विविध रचनाओं का खदान ‘कुंवर नारायण’

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लेखिका :अदिति सकलानी

प्रसिद्ध कवि और साहित्यकार कुंवर नारायण का 15 नवंबर को निधन हो गया । वह जनता के कवि थे , समाज के कवि। उनकी कविताओं में मानवीय मूल्यों, नैतिकता, परंपरा, इतिहास, मिथक आदि का समावेश देखने को मिलता है । कुंवर नारायण का जन्म  19 सितंबर, 1927 को उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद ज़िले में हुआ । उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से इंग्लिश लिटरेचर में पोस्ट ग्रेजुएशन किया और अपने पुश्तैनी ऑटोमोबाइल बिज़नस में शामिल हो गए लेकिन धीरे धीरे सत्यजीत रे, आचार्य नरेंद्र देव और आचार्य कृपलानी से प्रभावित होकर , उनकी रूचि साहित्य में बढ़ती चली गयी । वह कवि होने के साथ साथ रचनाकार भी थे इसलिए उन्होंने कविता, कहानी , समीक्षा, आलोचना की विधा में कई रचनाओं को जन्म दिया । इनके बारे में सबसे अनूठी बात यह है कि कई साहित्यकार इनके लिए जोगी, ऋषि,संत जैसे विशेषणों का प्रयोग करते नज़र आते हैं, जिससे इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कुंवर नारायण का व्यक्तित्व कितना निश्छल और पाक था ।

1927 में जब कुंवर नारायण का जन्म हुआ तो देश अंग्रेजों से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था और आज जब कुंवर नारायण जा चुके हैं तो देश जातिवाद, कालाधन, घोटालों से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा है । इन्होंने सदैव समाज में विलुप्त बुराईयों का खंडन किया है और यह उन दिग्गज कवियों  में से एक हैं जिनकी कृतियों में विद्रोह रस भी देखने को मिला है ।

 

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Kuwar Narayan recieved Padma Bhushan Award in 2009 Courtesy : Wio News

 

कुंवर नारायण को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इन्हें श्रेष्ठ भारतीय साहित्य के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाज़ा गया । साथ ही इन्हें हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार , प्रेमचंद पुरस्कार, तुलसी पुरस्कार,व्यास पुरस्कार, कबीर सम्मान आदि भी प्राप्त हुए। इसके अलावा भारत सरकार ने इन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया और यह भारत के एकमात्र ऐसे कवि हैं , जिन्हें रोम का अंतर्राष्ट्रीय ‘प्रीमियो फेरोनिया सम्मान ‘ भी हाल ही में प्राप्त हुआ ।

कुंवर नारायण की कविता ‘आयोध्या 1992’ में काफी समय तक चर्चाओं और सुर्ख़ियों में रही। इस कविता में इन्होंने आज के समाज पर चोट मारी है और इस समाज में छुपी गन्दगी की ओर इशारा करते हुए राम को कहा है कि तुम वापस लौट जाओ क्योंकि यह त्रेतायुग नहीं नेतायुग है।

उनकी प्रमुख काव्यकृतियां हैं- चक्रव्यूह(1956), तीसरा सप्तक(1959), परिवेश:हम-तुम(1961), आमने सामने (1979) आदि।कुछ प्रमुख रचनायें हैं – आवाज़ें, घण्टी,आयोध्या 1992,घर पहुंचना, प्यार के बदले आदि। भले ही कुंवर नारायण आज हमारे बीच नहीं रहे लेकिन एक कवि की मृत्यु तब तक नहीं होती जब तक उनकी रचनाओं, कविताओं को पढ़ा जाए। कुंवर नारायण की कविताओं को हमेशा ही पढ़ा जायेगा इसीलिए समाज के लिए,पाठकों के लिए  यह महान कवि अमर हैं।